मोदी सरकार एक तरह देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने का दावा कर रही है। वहीं दूसरी तरफ देश के विदेशी मुद्रा भंडार में लाखों करोड़ रुपयें की कमी आई है।

विदेशी मुद्रा भंडार मुद्रा संकट की घड़ी में काम आता है। किसी भी आर्थिक संकट या युद्ध की स्तिथि में सरकार इसी पर आश्रित होती है। इसके बूते देशों की साख तय होती है, और अंतरराष्ट्रीय कर्ज की अदायगी भी होती है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार में पैसों की भारी कमी आई है। पिछले चार महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार 424 अरब डॉलर से घटकर 401 अरब डॉलर पर आ गया है। मतलब केवल चार महीनों में इसमें एक लाख 38 हज़ार 400 करोड़ रुपियें की कमी आई है।

वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने और रुपये के लगातार कमज़ोर होने को इसके बड़े कारण माना जा रहा है। दरअसल, कच्चे तेल के दाम बढ़ने के कारण उसकी कीमत तो ज्यादा चुकानी पड़ ही रही है वहीं दूसरी तरफ रुपये के कमज़ोर होने से कीमत में और भी बढ़ोतरी हो रही है।

साथ ही जिस तरह देश का व्यापार घाटा बढ़ रहा है वो भी इसका बड़ा कारण है। निर्यात और आयात के बीच के अंतर को व्यापार घाटा कहा जाता है। जो देश निर्यात के मुकाबले आयात ज्यादा करता है उसका व्यापार घाटा नुकसान में रहता है।

भारत के साथ भी यही स्तिथि है। और ये पिछले कुछ समय में और भी भयावह हुई है। इसी साल जून महीने का व्यापार घाटा पिछले पांच सालों में सबसे ज़्यादा रहा है।

मोदी सरकार आई तो थी ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर देश के उत्पादन को बढ़ाने जिस से देश का निर्यात भी बढ़ सके। लेकिन सरकार द्वारा लागू की गई नोटबंदी और जीएसटी ने उत्पादन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुँचाया है। इस कारण निर्यात में बढ़ोतरी नहीं हो रही है और आयात बढ़ता जा रहा है।