मोदी सरकार किसी ना किसी तरह सरकारी संस्थाओं से लेकर सरकारी परियोजनाओं तक में नीजिकरण को बढ़ावा देने में लगी है। यही काम सरकार ने अपनी महत्वकांक्षी सड़क योजनाओं के साथ किया। लेकिन अब उनका बुरा हाल है।

मोदी सरकार की सड़क परियोजनाएं समय पर पूरी होती नहीं नज़र आ रही हैं। लगातार उनके बनने की रफ़्तार धीमी पड़ रही है। इसके कारण सड़क निर्माण का काम पीपीपी मॉडल के अधीन ऐसी निजी कंपनियों को देना माना जा रहा है, जो पहले से ही कर्ज़ में डूबी थी। उनकों बैंकों से कर्ज़ भी नहीं मिल पा रहा है। सवाल ये भी है कि सरकार ने ऐसी कंपनियों को ठेका ही क्यों दिया।

अब इन कंपनियों के जरिए काम पूरा नहीं हो पा रहा है। अगले साल 2019 लोकसभा चुनाव होने के बावजूद सरकार इस मामले में कुछ ज़्यादा काम करती दिखाई नहीं दे रही है।

मोदी सरकार ने घोषणा की है कि 2022 के अंत तक यानि पाँच साल में वे 83,000 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण कर लेंगे। इस निर्माण की लागत का अनुमान 7 लाख करोड़ रुपये था।

इसमें भारत माला परियोजना शामिल थी जिसमें 34,000 कि.मी. सड़कों का समावेश शामिल था जो प्रमुख बुनियादी ढाँचे के अंतराल को भरेंगे। यह भी दावा किया गया था कि इस बड़े पैमाने पर निर्माण से बड़े स्तर पर नौकरियाँ पैदा होंगी और ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत ज़रूरी धन को निवेश करेगा।

लेकिन राजमार्ग निर्माण डेटा पर एक नज़र से पता चलता है कि यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम अधर में पड़ गया है। निर्माण कार्य धीमा हो गया है। हासिल सड़क बनाने की गति 2017-18 में लक्ष्य का 51 प्रतिशत थी और इस क्षेत्र में क्रेडिट (कर्ज़) प्रवाह में कमी आई है और जिन कंपनियों को आकर्षक अनुबंध दिए गए हैं वे पहले से ही गहरे कर्ज में हैं।

बड़े ऋण से दबी कंपनियों को गड़बड़ी से बाहर निकलने के लिए और अधिक ऋण की जरूरत है। इस बीच भारतीय बैंकिंग क्षेत्र एनपीए या बुरे ऋणों के खतरनाक उच्च स्तर (और बढ़ते) से पीड़ित है। इसलिए, वे देनदार कंपनियों को पहले से ही क्रैक करने के लिए और अधिक उधार देने में अनिच्छुक हैं।