भारत में एक बार फिर नए सिरे से राष्ट्रवाद पर चर्चा होनी चाहिए। और ये तय किया जाना चाहिए कि राष्ट्रवाद क्या है? फिलहाल जिस तरह से राष्ट्रवादी होने या ना होने का सर्टिफिकेट बांटा जा रहा है वो देश की अखंडता को नुकसान पहुंचा रहा है।

मौजूदा राजनीतिक परिवेश समाज को हिंसक बना रहा है। सड़कों पर हिंसा, मॉब लिंचिंग जैसे गंभीर अपराध आम हो चले हैं। इस महौल में रवींद्रनाथ टगौर द्वारा दी गई राष्ट्रवाद की परिभाषा पर चर्चा होनी चाहिए। नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टगौर अपने लेख ‘राष्ट्रवाद’ में लिखते हैं…

”देशप्रेम हमारा आख़िरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता। मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरे के दाम में ग्लास नहीं ख़रीदूंगा और जब तक मैं ज़िदा हूं मानवता के ऊपर देशप्रेम की जीत नहीं होने दूंगा।”

बात साफ है टगौर मानवता राष्ट्रवाद से ऊपर नहीं मानते। टैगोर के लिए राष्ट्रवाद ग्लास जितनी सस्ती है जिसे वो मानवतावाद के बेशकीमती हीरे से नहीं ख़रीदना चाहते हैं।

क्या किसी को रवींद्रनाथ टगौर के राष्ट्रवादी होने पर संदेह है? अगर है तो ये जान लें कि जिस राष्ट्रगान (जन गन मन) को आज राष्ट्रवाद का परिचायक माना जा रहा है उसे रवींद्रनाथ टगौर ने ही लिखा है।

राष्ट्रवाद के नाम पर सनक के ख़तरे क्या हो सकते हैं इसके कई उदाहरण इतिहास में मौजूद हैं। उससे सिखकर वर्तमान में सतर्क होने की जरूरत है। लोकतंत्र का चोला पहने कई हिटलर आज अपना फर्जी राष्ट्रवादी एजेंडा चला रहे हैं।

इसका सीधा नुकसान देश के गरीब, मजदूर, छात्र और महिला को हो रहा है। युवाओं को राष्ट्रवाद का सींग पहनाकर सड़कों पर छोड़ दिया है। ये हिंसा और नफरत में खुद को और देश को बर्बाद कर रहे हैं। उधर सरकार अपने उधोगपति मित्रों को आर्थिक लूट का लाइसेंस बाट रही है।

इस फर्जी राष्ट्रवाद के चक्कर में गरीब और गरीब, अमीर और अमीर हो रहा है। JNUSU के पूर्व अध्यक्ष मौजूदा सरकार पर फर्जी राष्ट्रवाद फैलाना का आरोप लगाते हुए लिखते हैं…

‘फ़र्ज़ी राष्ट्रवादियों की इस सरकार ने देश के युवाओं को बेरोज़गार और हिंसक बना दिया है। सड़कों पर हिंसा को बढ़ावा देकर और नफ़रत की बहस में युवाओं को उलझाकर ये लोग असल में आर्थिक लूट का दायरा बढ़ाते जा रहे हैं।’