मुकेश अंबानी की रिलायंस ग्रुप को सिंगापुर के एक कोर्ट के फैसले के साथ बड़ी राहत मिली है। लेकिन वहीं भारत को इस फैसले से 30,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

दरअसल, सरकारी कंपनी ओएनजीसी ने रिलायंस पर उसके क्षेत्र से 30 हजार करोड़ रुपए की प्राकृतिक गैस चुराने का आरोप लगाया था। मामला, रिलायंस के विरुद्ध होने के बावजूद मोदी सरकार इस मामले को सिंगापुर ले जाने के लिए राज़ी हो गई। जहाँ रिलायंस केस जीत गई।

क्या है मामला

2014 लोकसभा चुनाव से एक दिन पहले यानि यूपीए सरकार के समय ओएनजीसी ने 15 मई, 2014 को दिल्ली उच्च न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया जिसमें यह आरोप लगाया कि रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) उसके गैस ब्लॉक से हजारों करोड़ रुपये की गैस चोरी की है।

बता दें, कि आंध्र प्रदेश कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन समुंदरी क्षेत्र में ओएनजीसी और रिलायंस को गैस निकालने का ठेका मिला था। आरोप है कि रिलायंस ने जानबूझकर दोनों ब्लॉकों की सीमा के बिलकुल करीब से गैस निकाली, जिसके चलते ओएनजीसी के ब्लॉक की गैस आरआईएल के ब्लॉक में आ गयी।

ओएनजीसी के चेयरमैन डीके सर्राफ ने 20 मई 2014 को अपने बयान में कहा कि ओएनजीसी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के खिलाफ जो मुकदमा दायर किया है, उसका मकसद अपने व्यावसायिक हितों की सुरक्षा करना है। क्योंकि रिलायंस की चोरी के चलते उसे लगभग 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

अबतक भाजपा लोकसभा चुनाव जीत चुकी थी। सरकार ने 23 मई को रिलायंस, ओएनजीसी और पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों की एक बैठक करवायी और सबने मिलकर इस मामले के अध्ययन के लिए एक समिति बनाने का निर्णय लिया जिसमे रिलायंस ओर सरकारी प्रतिनिधि शामिल थे।

समिति ने इस मामले की जांच कराई। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि ओएनजीसी के ब्लॉक से आरआईएल के ब्लॉक में 11,000 करोड़ रुपये की गैस गयी है।
इस रिपोर्ट पे निर्णय देने के लिए मोदी सरकार ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए.पी. शाह समिति का गठन किया। समिति का काम इस मामले में हुई भूलचूक देखना और ओएनजीसी के मुआवजे के बारे में सिफरिश करना था।

शाह समिति ने इस मामले स्पष्ट रूप से कहा कि मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज को ओएनजीसी के क्षेत्र से गैस अपने ब्लाक में बह या खिसक कर आयी गैस के दोहन के लिए उसे सरकार को 1.55 अरब डॉलर भुगतान देना होगा।

मामला पूरी तरह सरकार और ओएनजीसी के पक्ष में जा चुका था। उसके बाद अचानक से सरकार ने रिलायंस की ये बात मानली कि मामला को अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में ले जाया जाए। वो भी सिंगापुर जैसे देश में जो कालेधन को छुपाने और निवेश करने के लिए जान जाता है। क्योंकि वहां का कानून ही इसकी इजाज़त देता है।

अब सिंगापुर में जजों के पैनल ने जो रिलायंस ओर मोदी सरकार की सहमति से चुनी गई थी,उसने ओएनजीसी की शिकायत को रद्द कर रिलायंस से 10 हजार करोड़ के जुर्माना हटा दिया है जो 2016 में जस्टिस ए पी शाह आयोग द्वारा रिलायंस को दंडित करने की सिफ़ारिश के चलते सरकार को लगाना पड़ा था।

अपने फैसले में ट्रिब्यूनल ने रिलायंस का पक्ष सही बताते हुए भारत सरकार को ये आदेश दिया है कि उसको हरजाने के तौर पर लगभग 50 करोड़ रू रिलायंस को देने होंगे।

मोदी सरकार पर आरोप

मोदी सरकार पर इस फैसले के आने के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि सरकार ने हजारों करोड़ के गैस चोरी मामले में सरकारी कंपनी ओएनजीसी को तरजीह ना देकर रिलायंस को अहमियत क्यों दी? क्यों ओएनजीसी के आरोप और जस्टिस ए पी शाह आयोग द्वारा रिलायंस को मामले में अपराधी माने जाने के बावजूद उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं हुई?

सबसे महवपूर्ण सवाल मामला ओएनजीसी के पक्ष में होने के बावजूद सरकार ने रिलायंस की ये मांग क्यों मानी कि इस मामला की सुनवाई सिंगापुर की अदालत में होगी जबकि मामला उस समय दिल्ली हाईकोर्ट में था?