जीएसटी काउन्सिल की पिछले हफ्ते हुई बैठक को लेकर बहुत ज़्यादा हल्ला हो रहा है। टीवी और प्रिंट मीडिया से सोशल मीडिया तक इसी बात पर चर्चा की जा रही है कि केंद्र सरकार ने किस तरह वस्तुओं से जीएसटी की दरे घटाकर राहत दी है।

सबसे ज़्यादा चर्चा का मुद्दा सैनिटरी नैपकिन पर जीएसटी ख़त्म करना रहा। लम्बे समय से सैनिटरी नैपकिन पर से जीएसटी को हटा लेने की मांग हो रही थी। लेकिन क्या जीएसटी हटाने से महिलाओं को फायदा होगा? या दाम उतने ही बने रहेंगे?

दरअसल, वस्तु उत्पादनकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने जीएसटी की दरे तो कई वस्तुओं पर से कम की हैं लेकिन लोगों को इस से फायदा नहीं होगा। क्योंकि इस फैसले को इस तरह से लिया गया है कि वस्तुओं के दाम घटेंगे ही नहीं।

‘द फेमिनाईन एंड इन्फैंट हाइजीन एसोसिएशन’ ने बिज़नस स्टैण्डर्ड से कहा कि सैनिटरी नैपकिन से जीएसटी हटाने के फैसले के साथ सरकार ने सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली कंपनियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट देना भी बंद कर दिया है।

इस कारण कंपनियों का मुनाफा खत्म हो गया है। इसलिए कंपनियों को मुनाफे के लिए सैनिटरी नैपकिन की कीमत बढ़ानी होगी। इस तरह अंत में खरीदारों को कोई फायदा नहीं होगा।

सवाल है कि सरकार ने महिलाओं की इस ज़रूरत को सस्ता करना का सारा बोझ कंपनियों पर क्यों डाला? ये ज़िम्मेदारी सरकार की है न कि कंपनियों की कि वो सस्ते सैनिटरी नैपकिन मुहय्या कराए?

एक तरह से सरकार ने चालाकी से कंपनियों के मुनाफे की एक सीमित व्यवस्था खत्म करते हुए इसका नीजिकरण कर दिया है। अब मुनाफे के लिए कम्पनियाँ इसके दामों में इज़ाफा करेंगी। और सवाल करने पर सरकार कहेगी कि अब ये समस्या हमारे दायरे से बाहर है। लेकिन सत्ता की गोद में बैठा मीडिया फैसले का विश्लेषण करने के बजाए इसे अभी भी सरकार की ओर से मिली बड़ी राहत बता रहा है।