वाराणसी में हुए फ्लाईओवर हादसे में कई लोगों के मारे जाने की ख़बर है। साथ ही ये सवाल भी उठने लगा है की आखिर साल 2015 से बनते बनते ये 1710 मीटर का फ्लाईओवर में बनने में इतनी देरी क्यों लगी। जबकि इससे कम समय में लखनऊ मेट्रो जो करीब 8 किलोमीटर से ज्यादा का सफ़र तय करती है वो बनकर तैयार हो गया था।

दरअसल वाराणसी में फ्लाईओवर का निर्माण कैंट रेलवे स्टेशन के पास किया जा रहा था। जो 25 अक्टूबर में शुरू हुआ जिसे मार्च 2018 तक ख़त्म हो जाना था। मगर ऐसा हुआ नहीं और काम जारी रहा है। वही दूसरी तरफ लखनऊ मेट्रो परियोजना की शुरुआत 2013 में शुरू होकर साल 2017 में पूरी हुई और लखनऊ में मेट्रो  दौड़ने भी लगी।

मगर वाराणसी में 3 साल में 1710 एक फ्लाईओवर जिसे आन्ध्रा पुल से लहरतारा पुल से जोड़ना था उसका काम ही नहीं पुरा हो पाया है। ऐसा नहीं है की इस फ्लाईओवर को लेकर पहले सवाल नहीं उठे पिछले साल जुलाई महीने में फ्लाईओवर की डिज़ाइन को लेकर सवाल उठे थे, ऐसा कहा जाने लगा था कि ये फ्लाईओवर आमजन के परेशानी का सबब बन सकता है।

इससे पहले भी रोडवेज बस स्टेशन के ठीक सामने से चौकाघाट की शुरुआत में चार पिलर और डेक स्लैब बनते ही भारी वाहनों के चोट से हिल गए। मगर इस समस्या को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

साल 2017 में बने चार पिलर और डेक स्लैब भारी वाहनों के ऊपरी हिस्से से टकराकर हिलने लगे थे। मगर इसका जुगाड़ निकला गया की सेतु निगम ने भारी वाहनों की एंट्री पर रोक लगा दी।

क्योकिं सर्विस लेन इतनी चुस्त दुरस्त थी नहीं तो ये आशंका जताई जाते जब नई सड़क बनेगी तो सड़क की ऊंचाई और अधिक हो जाएगी। यह डेक स्लैब के लिए कतई ठीक नहीं होगा। उस स्थिति में भारी वाहनों का ऊपरी हिस्सा और ज्यादा टकराएगा, इससे समस्या और विकराल रूप लेगी इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात ये है की अभी तक इस फ्लाईओवर का काम सिर्फ 23 प्रतिशत तक ही पुरा हो पाया है। जिससे सवाल उठाता की आखिर 2 किलोमीटर से कम इस फ्लाईओवर में इतनी देरी क्यों हुई।

जबकि इस शहर में अक्सर पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी दौरे करते रहते है। सवाल ये भी उठता है की जब 8 किलोमीटर से ज्यादा लखनऊ मेट्रो को 3 साल से कम वक़्त मेट्रो ट्रायल शुरू करवा दिया था मगर 1710 मीटर के इस फ्लाईओवर में आखिर इतनी देरी क्यों हुई?