9 अगस्त अपने आप में एक ऐतिहासिक तारीख है। भारत के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए। 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के नागासाकी शहर पर परमाणु बम गिराया था। 9 अगस्त 1942 को ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया था। 9 अगस्त को और भी बहुत कुछ हुआ है।

लेकिन इन सब के अलावा 9 अगस्त को कुछ ऐसा भी हुआ था जिसने दुनिया भर के मूलनिवासियों को प्रभावित किया। मूलनिवासी यानी आदिवासी, वनवासी। 9 अगस्त को हर साल विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

9 अगस्त को क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस?

दरअसल 1994 में 9 अगस्त के दिन स्विट्ज़रलैंड के जेनेवा शहर में एक विशाल सम्मेलन हुआ था। ये सम्मेलन था दुनियाभर के आदिवासियों के प्रतिनिधियों का। इस सम्मेलन का आयोजन संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा किया गया था।

इस सम्मेलन का मकसद आदिवासियों को उनका अधिकार दिलाना, उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि को संरक्षित करना था। 9 अगस्त 1994 को हुए इस सम्मेलन के बाद से विश्व भर में 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाया जाने लगा।

भारत में 9 अगस्त को तमाम सरकारें आदिवासी दिवस के नाम पर उत्सव मनाती हैं। लेकिन आदिवासी दिवस सिर्फ उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व, संघर्ष, हक-अधिकारों और इतिहास को याद करने के लिए ही है। साथ ही आदिवासी दिवस जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की समीक्षा करने का भी दिन है।

सरकारें वोट और दिखावे के लिए आदिवासी दिवस मनाती तो हैं लेकिन अफसोस भारत का आदिवासी समुदाय आज भी उपेक्षित है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विनोद कुमार विश्व आदिवासी दिवस पर लिखते हैं ‘आदिवासी दिवस की बधाई लेकिन साथी याद रखना, झारखंड की जेलों में तीन हजार आदिवासी “निर्दोष” होने की सजा भुगत रहे हैं’

भारत में आदिवासियों की स्थिति

पर्यावरण और प्रकृति के सजग रक्षक सही मायने में वनवासी ही हैं। लेकिन आधुनिकता जैसे भ्रम ने हमारे समाज में जिस कदर पैर पसारने शुरु किए हैं, ना सिर्फ हिन्दुस्तान बल्कि सारी दुनिया के आदिवासी समुदाय खतरें में हैं। अगर समय रहते इनकी सुरक्षा नहीं कि गई तो इनके विलुप्त होने की पूरी गुंजाईश है।

आज भारत में आदिवासी समाज एक गंभीर मोड़ पर खड़ा है। राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से सबसे गरीब और हाशिये पर हैं। वैश्विकरण के दबाव में उनकी जमीनें और संसाधन खतरे में है। आदिवासी प्रथम नागरिक होते हुए भी, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने को मजबूर है।

2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में आदिवासी कुल आबादी के 8.14% हैं। इनकी संख्या तेजी से घट रही है। विस्थापन और नक्सली हिंसा के नाम पर आदिवासियों के मारे जाने के कारण उनकी जनसंख्या में कमी आई है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही तरह से इसके लिए केंद्र और राज्य की सरकारें जिम्मेदार हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकारें आदिवासियों के लिए दिखावटी कल्याणकारी योजनाएं नहीं बनाती। आदिवासी समुदाय को वोट बैंक मानते हुए सरकारें उनके कल्याण की योजनाएं एवं कानून तो बनाती रही हैं। लेकिन वो योजनाएं दस्तावेजों से निकलकर कभी जमीन पर नहीं पहुंच पाती।

मुख्य समस्या

आजादी के 7 दशक बाद भी आदिवासियों की आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया है। स्वास्थ्य सुविधाएँ, पीने का साफ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए वे आज भी तरस रहे हैं। आदिवासियों की मुख्य समस्या है उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन।

जल, जंगल और जमीन के मालिक आदिवासी हैं, इससे इनका अस्तित्व जुड़ा है। भारत के संविधान समेत यूएनओ भी इस बात को मानता है। लेकिन उधोगपतियों की गुलाम सरकारें इस बात को समझना ही नहीं चाहतीं। जंगल के जंगल उजड़ रहे हैं। आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं लेकिन सरकार मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि आदिवासियों का भविष्य जमीन से जुड़ा है।

देश के विकास नाम पर उधोगपतियों की तिजोरी भरने के लिए लाखों की संख्या में आदिवासियों को उजार दिया। देश के कथित विकास की सबसे ज्यादा कीमत आदिवासियों ने चुकायी है। विस्तापन के नाम पर जंगल में रहने वाले प्राकृतिकवादी आदिवासियों को टीन के डब्बों में ठूस दिया गया है।

सरकारें कहती है कि आदिवासी विकास विरोधी हैं, नक्सलियों से मिले हुए हैं। कई मौकों पर सरकार की इन अफवाहों का खुलासा भी हुआ है। आदिवासी विकास का नहीं लूट का विरोध करते हैं। एक उदाहरण से समझिए…

सरकार कहती है आदिवासी सड़क नहीं बनने दे रहे हैं, विकास का विरोध कर रहे हैं, नक्सलियों से मिले हुए हैं। लेकिन हकीकत ये होती है कि आदिवासी सड़क का नहीं हवाई पट्टी जितनी चौड़ी बनने वाली सड़कों का विरोध करते हैं। क्योंकि वो सड़क आदिवासियों को शहर से जोड़ने या उनके बच्चों को स्कूल तक ले जाने के लिए नहीं होतीं।

वो चौड़ी सड़क आधोगपतियों द्वारा जंगल से लूटे गए खनिजों को बाहर ले जाने के लिए बनाई जा रही होती है। सरकार जंगलों में सड़क आदिवासियों के लिए नहीं उधोगपतियों के लिए बनाती है। क्योंकि आदिवासियों को हवाई पट्टी जितनी चौड़ी सड़क की जरूरत नहीं है। वो तो मूलभूत संसाधनों के लिए तरस रहे हैं। शहर से गया हुआ उधोगपति जंगल जाकर और ज्यादा अमीर हो जाता है लेकिन जंगल में रहने वाले आदिवासी हर रोज पिछड़ रहे हैं। ऐसा क्यों है?

आदिवासियों की मांग

आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासी समाज का अपनी धरोहर, अपने पारंपरिक सामाजिक मूल्यों और अधिकारों के साथ ही विकास हो, इसके लिए भारतीय संविधान में प्रावधान किये गये हैं। आदिवासी समाज को जल-जंगल-जमीन विहीन होने से बचाने के लिए कानून भी बनाये गये। लेकिन जमीन पर ये कानून किसी काल्पनिक कहानी की तरह लगते हैं जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता।

. 5वीं अनुसूची

तमाम आदिवासी समुदायों की पहली मांग है कि संविधान की 5वीं अनुसूची को उसके मूल रूप में लागू किया जाए। अब सवाल उठता है कि क्या है 5वीं अनुसूची?

अंग्रेजों के शासनकाल में भी आदिवासी क्षेत्र आजाद थें। ऐसे में जब भारत को 1947 में आजादी मिली तो इन क्षेत्रों को संविधान की 5वीं और छठी अनुसूची में वर्गीकृत किया गया। संविधान में 5वीं अनुसूची के निर्माण के समय तीन बातें स्पष्ट तौर पर कही गईं- सुरक्षा, संरक्षण और विकास

5वीं अनुसूची के तहत आदिवासी क्षेत्रों के जल जंगल जमीन पर पूरा अधिकार आदिवासियों को ही दिया गया। 5वीं अनुसूची में इसी व्यवस्था को ग्रामसभा के रूप में मान्यता दी और उसे ज़मीन बेचने और सरकारी अधिग्रहण संबंधी अधिकार दिए।

साथ ही अपनी भाषा, संस्कृति, पहनावा, रीति-रिवाज़ और बाज़ार की व्यवस्था तय करने का अधिकार मिला कि बाज़ार में क्या बिके, क्या न बिके? गांव चाहता है कि शराब न बिके तो नहीं बिकेगी।

लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि आदिवासी क्षेत्रों में कुछ भी आदिवासियों की मर्जी से नहीं चल रहा है। यानी सीधे सीधे उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। सरकार जब चाहती है अपने उधोगपति मित्रों के लिए आदिवासियों के गांवों को उजार देती है।

पुलिस और CRPF की मदद से आदिवासियों का गांव उजारा जाता है। जो आदिवासी अपना गांव छोड़ने को तैयार नहीं होते पुलिस उन्हें जेल में डाल देती है या गोली मार देती है। और अगले दिन अखबार में छपता है कि ‘अमुक क्षेत्र में मारे गए तीन नक्सलवादी’

. समता जजमेंट लागू हो

अगर सरकार ईमानदारी से संविधान के तहत आदिवासियों का विकास करना चाहती है। तो जरूरत है देश के तमाम आदिवासी क्षेत्रों में समता जजमेंट को लागू करने की। कई दशकों से आदिवासी इसकी मांग कर रहे हैं। अब सवाल उठता है कि समता जजमेंट क्या है?

यह जजमेंट आंध्र प्रदेश से संबंधित है। जुलाई 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि आदिवासी जमीन को लीज पर देने अथवा अधिग्रहण के बाद संबंधित कंपनी को होने वाले कुल लाभ का 20 फीसदी हिस्सा पर्यावरण संतुलन और क्षेत्रीय विकास पर खर्च करने की बाध्यता होगी, वहीं विस्थापितों के बेहतर पुनर्वास की जवाबदेही सरकार की होगी।

सरकार को कोई नया कानून बनाने की जरूरत नहीं है। आदिवासियों के लिए संविधान में पहले से जो कानून मौजूद हैं, अगर उन्हें ही पूरी सख़्ती से लागू कर दिया जाए तो बहुत कुछ बदल सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारों को कॉरपोरेट की गोदी से उतरना पड़ेगा, जो फिलहाल तो मुमकीन नहीं लग रहा है।