अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मुल्क’ 3 अगस्त को रिलीज हो रही है। मुख्य भूमिका में ऋषी कपूर, तापसी पन्नू, प्रतीक बब्बर आदि हैं। इस फिल्म की कहानी एक भारतीय मुसलमान की जिंदगी में चल रही जद्दोजहद पर है।

फिल्म में ऋषी कपूर एक भारतीय मुसलमान का रोल निभा रहे हैं। कोर्ट रूम की कार्रवाई के दौरान ऋषी कपूर एक बहुत ही जबरदस्त डायलॉग बोलते हैं। वो कहते हैं कि ”अगर आप मेरी दाढ़ी और ओसामा बिन लादेन की दाढ़ी में फर्क नहीं कर पा रहे, तो भी मुझे हक मेरी सुन्नत निभाने का।”

ये डायलॉग मुसलमान = आतंकवादी समझने वाले लोगों के दिमाग की खिड़की खोलने के लिए है। लेकिन अफसोस जिस देश की मानसिकता को भारतीय संविधान नहीं बदल पाया उसे एक फिल्मी डायलॉग क्या ही बदलेगा।

समाज में रच-बस चुके नफरत का ताजा उदाहरण दिल्ली से सटे गुरूग्राम में देखने को मिला है। मेवात के गांव बादली में रहने वाले जफरुद्दीन नामक युवक की जबरदस्ती दाढ़ी काट दी गई है। दरअसल जफरुद्दीन नाई की दुकान पर बाल कटवाने गया था।

दुकान में पहले से मौजूद दो युवक जफरुद्दीन की दाढ़ी पर कमेंट करने लगे। फिर जफरुद्दीन पर दाढ़ी कटवाने का दबाव बनाने लगे। जब जफरुद्दीन ने इसके लिए मना किया तो दोनों युवकों ने जबरदस्ती कुर्सी पर बांध दिया। फिर नाई से दाढ़ी काटने को कही।

लेकिन नाई ने ऐसा करने से मना कर दिया। फिर उन्होंने नाई को भी पीटा और उसके बाद उसकी दाढ़ी कटवा दी। अब सवाल उठता है कि जफरुद्दीन के साथ ऐसा क्यों किया गया? जबकि संविधान सभी को अपने धर्म और उसकी मान्यताओं का पालन करने का अधिकार देता है।

संविधान के अनुच्छेद-25 से लेकर 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता की बात है। अनुच्छेद-25 में हर किसी को किसी भी धर्म का पालन करने और मानने का अधिकार है। उसका प्रचार प्रसार और प्रवचन करने का भी अधिकार है। इसी अनुच्छेद के तहत सिख धर्म के लोगों को कृपाण धारण करने का अधिकार भी मिला हुआ है।

संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद भी मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार की घटना क्यों होती है? दाढ़ी तो हिंदू साधू भी रखते हैं, सिख भी रखते हैं लेकिन दिक्कत मुसलमानों की ही दाढ़ी से क्यों है?

कृपाण लिए सिख समुदाय के लोगों को संदिग्ध निगाहों से नहीं देखा जाता, त्रिशुल और भाला लेकर घूम रहे साधू बाबा को संदिग्ध निगाहों से नहीं देखा जाता लेकिन दाढ़ी-टोपी वाले मुसलमान को संदिग्ध निगाहों से देखा जाता। ऐसा क्यों है?

ऐसा भी नहीं है सिर्फ दाढ़ी वाले मुस्लिम ने ही आतंकी घटना को अंजाम दिया है। इसी भारत में दाढ़ी वाले सिखों ने भी आतंकी घटना को अंजाम दिया है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हत्या उनके सिख अंगरक्षक ने की, खालिस्तान की मांग को लेकर इस देश तोड़ने की कोशिश जनरैल सिंह भिंडरांवाला (सिख) ने की। ऐसे ही तमाम आतंकी संगठनों में हिन्दू समुदाय के लोग भी लिप्त पाए गाए हैं।

अन्य धर्म के लोगों को संदिग्ध निगहों से नहीं देखा जाता लेकिन दुनिया भर में कुछ आतंकवादी मुस्लिम धर्म के पकड़े गए हैं इसलिए सभी मुसलमानों को संदिग्ध नजरों से देखा जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए।

हम यहां सिख या अन्य धर्म के लोगों को आंतकी नहीं बता रहे हैं। बस देखने के नजरिए पर सवाल उठा रहे हैं। दरअसल किसी भी धर्म को आतंकवाद से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। कोई भी धर्म आतंवाद के लिए जिम्मेदार नहीं होता। हां, उससे जुड़े लोग और धर्म के ठेकेदार आतंकी हो सकते हैं।