साम्प्रदायिकता के अलावा मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर सबसे ज़्यादा विरोध का सामना कर रही है। ये आरोप लगाया जा रहा है कि ये सरकार अर्थव्यवस्था को सँभालने में नाकाम रही है और इसका बोझ वो देश की सरकारी कंपनियों पर डाल रही है।

देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का नाम भी इसी लिस्ट में शामिल है। वर्ष 2014, में सत्ता में आने के बाद लगातार मोदी सरकार एलआईसी के खजाने से सरकारी कंपनियों को बेचने के लिए पैसा निकाल रही है ताकि उसकी ख़राब आर्थिक नीतियों के चलते जो टैक्स की कमी हुई है उसे पूरा किया जा सके।

दरअसल, जिन आर्थिक वादों के दम पर भाजपा सत्ता में आई उन्हें पूरा करने में वो असमर्थ रही। जीएसटी को इस सरकार ने भारत की सबसे बड़ी आर्थिक क्रांति बताया लेकिन उसके लागू होने के बाद बाज़ार में उद्योगों को नुकसान तो हुआ ही बल्कि सरकारी टैक्स में भी उतनी बढ़ोतरी नहीं हो पाई जितनी उम्मीद की गई थी।

अपने वार्षिक वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए फिर सरकार ने एलआईसी का इस्तेमाल करना शुरू किया। 2014 के बाद एलआईसी लगभग 48000 करोड़ रुपए सरकारी कंपनियों को खरीदने में लगा चुकी है। ये पैसा सीधा सरकार के पास जाता है जिस से वो अपने काम पूरा कर सके।

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2014 में एलआईसी ने सरकारी कंपनी भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) में 2,685 करोड़ रुपए के बदले 14.99% शेयर खरीदें। इसके बाद वर्ष 2015, में सरकारी कम्पन कोल इंडिया में 7000 करोड़ रुपए का निवेश किया।

इसी वर्ष इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन में 8000 करोड़ का निवेश किया। ये निवेश सरकार का सालाना विनिवेश टारगेट को पूरा करने के लिए किये गए।

वर्ष 2017,में एलआईसी ने भारत के सामान्य बीमा निगम में 8000 करोड़ रुपए का निवेश किया और उसी वर्ष न्यू इंडियन इंशोरेंस कंपनी के आईपीओ में 6,500 करोड़ रुपए का निवेश। मार्च 2018, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के आईपीओ में 2,900 करोड़ रुपए का निवेश किया गया।

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इसके बाद इसी वर्ष जून महीने में एलआईसी ने एनपीए के बोझ से डूबते अर्ध सरकारी बैंक आईडीबीआई को बचाया। इसमें भी कंपनी ने 12000 से 13000 करोड़ रुपए निवेश करने का फैसला किया है। सभी फैसलों के पीछे केंद्र सरकार है।

लेकिन सवाल ये है कि ये पैसा किसका है। एलआईसी में जमा पैसा सीधे तौर पर जनता का है। लेकिन सरकार उसे अपनी नकामियोंको छुपाने के लिए इस्तेमाल कर रही है।

एलआईसी में देश के करोड़ो लोगों का पैसा जमा है जिसे उन्होंने बीमा के तौर पर जमा किया हुआ है। अगर सरकार लगातार इस तरह से इसका उपयोग करती रहेगी तो एलआईसी के लाभार्थियों को कैसे अपना रिटर्न मिल पाएगा।