सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला को बड़ी राहत दी है। महिला को गोगोई को बदनाम करने के मामले में क्लीन चिट मिल गयी है।

लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की जाँच करने के लिए नियुक्त की गई जाँच समिति का कहना है कि बेंच फिक्सिंग में भी महिला का कोई हाथ नहीं है। मामले की जाँच के लिए ऐ.के. पटनायक के अंतर्गत ये समिति नियुक्त की गयी थी।

पटनायक ने सुप्रीम कोर्ट को कुछ दिनों पूर्व रिपोर्ट सौंपी थी जिसके मुताबिक कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश को बदनाम करने की साजिश में महिला कोटकर्मी शामिल नहीं है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में काम करने वाली एक महिला ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर कुछ महीने फले यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।

गोगोई को यौन उत्पीड़न के मामले में क्लीन चिट भी मिली गई थी जिसके बाद महिला ने कहा था कि उनकी न्याय पाने की उम्मीद खत्म हो गई। मुख्य न्यायधीश को इन-हाउस समिति से अपने ऊपर लगे आरोपों के लिए क्लीन चिट तो मिल गई थी, लेकिन महिला पर उलटा गोगोई को बदनाम करने के आरोप लगा दिए गए थे।

उत्सव नाम के वक़ील ने महिला के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायधीश को बदनाम करने की साजिश करने के आरोप लगाए थे। महिला के खिलाफ उन्होंने याचिका दायर भी की थी। अब महिला को उसी सुप्रीम कोर्ट से मामले में क्लीन चीट मिल गई है जिसको बदनाम करने का उसपर आरोप लगा था।

इसपर प्रतिक्रिया देते हुए गिरीश मालवीय लिखते है, “कुछ महीने पहले जब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन शोषण के आरोप सामने आए थे तो लगभग पूरा मीडिया और सोशल मीडिया भी यही मानकर इस घटना का विश्लेषण कर रहा था कि जस्टिस रंजन गोगोई जी को उक्त महिला फंसा रही है , यह कोई साजिश रची जा रही है जिसमे वह महिला सबसे बड़ा मोहरा है……लेकिन आज सच्चाई सामने आ गयी हैं.”

अब सवाल उठता है कि एक साथ दोनों लोग निर्दोष कैसे हो सकते हैं? क्या महिला को क्लीन चीट देने का ये मतलब नहीं कि वो कोई साज़िश नहीं कर रही थी? क्या इसका ये मतलब नहीं कि उसके लगाए गाए आरोप सही थे?