मोदी सरकार बनने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों को खूब मीठे मीठे ख्वाब दिखाए। किसान भी बड़ी उम्मीदों के साथ सरकार की तरफ टक-टकी लगाए बैठा था कि सरकार कुछ अच्छा करेगी।

वक़्त बीतता गया और पीएम मोदी अपने वादों पर मुकरते गए अगर किसानों की भाषा में कहे तो धोखेबाज़ी करते गए। और किसानों उनकी फसल का सही दाम दिलवाने में नाकाम रहे।

सत्ता को ग़लतफ़हमी है कि बुजुर्ग लाठियों से डर जाएगा, अरे जुल्मी वो किसान है जो लाठियां बोता है

सरकार बनते ही सबसे पहले सभी कर्जदार कारोबारी देश से फरार होने लगे। मगर किसानों पर कर्ज चढ़ जाने से कभी बैंक उनकी ज़मीन लेता तो कभी ट्रेक्टर।

मगर मजाल है की शराब कारोबारी विजय माल्या को कोई हाथ लगा देता ऐसा नहीं हुआ और वो विदेशों में ऐश करता रहा और खुद सरकार पर गंभीर आरोप लगाता रहा।

चाय वाले की सरकार में ‘किसानों’ को रोका जा रहा है और देश के ‘लुटेरों’ को विदेश भेजा जा रहा है

देश के लोगों को तब भी भरोसा था कि मोदी सरकार ज़रूर किसानों के लिए कुछ करेगी। मगर ताज्जुब करने वाली घटना तब हुई जब हीरा व्यापारी नीरव मोदी के साथ खुद पीएम मोदी एक फोटो में नज़र आए मगर किसानों की कर्जमाफी तब भी नहीं हुई।

मोदी सरकार ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि वो किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलवाने वाली की हर कोशिश करेगें जब वो सरकार में आयेंगें, मगर सरकार के चार बरस बीतने के बाद न किसानों को राहत मिली और न ही आम जनता को जो अपने प्रधानमंत्री से वो सबकुछ न पा सकी जिसकी उम्मीद से उसने केंद्र और राज्य सरकार में बीजेपी की सरकार बनवाई थी।

मगर फिर पीएम मोदी के दावों से ये समझ पाना मुश्किल है कि क्या वाकई वो किसानों के लिए परवाह करते है? और अगर करते है तो उनपर लाठियां और आसूं गैस के गोले दागने का क्या मतलब था?

किसानों को मारकर ‘जय किसान’ के विचारों का नरसंहार किया जा रहा है और हम चुपचाप देख रहे हैं : विशाल ददलानी

क्या मोदी सरकार अब भी ‘किसानों’ को मारकर ये साबित करने में जुटी हुई है की मोदी राज में बागों में बहार है।