चुनाव आयोग के मुताबिक भारत में कुल 7 ऐसे राजनीतिक दल हैं, जिनकी गिनती राष्ट्रीय दल के रूप में होती हैं। 1. ममता बनर्जी की TMC 2. मायावती की BSP 3. शिवकुमार सुधाकर रेड्डी की CPI 4. सीताराम येचुरी की CPIM 5. शरद पवार की NCP 6. अमित शाह की बीजेपी 7. राहुल गांधी की कांग्रेस

इन सातों पार्टियों में सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस और बीजेपी की होती है। इसका कारण ये भी है कि भारत पर ज्यादतर वक्त इन्हीं दो पार्टियों का शासन रहा है। इसलिए यही दो पार्टियां मीडिया को कंट्रोल करना जानती है और चर्चा में बनी रहती हैं।

मौजूदा वक्त में दोनों ही पार्टियों की स्ट्रेटेजी कमोबेश एक जैसी है। धर्म को धुरी बनाकर राजनीति करने वाली बीजेपी अब ज्यादा उग्र है। वहीं धर्म को जरुरत अनुसार इस्तेमाल करने वाली कांग्रेस अब खुद को जनेऊधारी बता रही है। आलम ये है कि कांग्रेस के पोस्ट बॉय राहुल गांधी सप्ताह में दो दिन मेनस्ट्रीम मीडिया की निगरानी में मंदिर दौरा करते हैं।

बीजेपी अपनी भगवा राजनीति के साथ पूरा न्याय कर रही है। बीच बीच में पीएम मोदी अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजरों में आने के लिए मस्जिद और दरगाह भी घूम आ रहे हैं।

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खुद को सबसे बड़ा धार्मिक घोषित करने की होड़ लगी है दोनों पार्टियों में। कोई खुद को सबसे बड़ा रामभक्त क्लेम कर रहा है, कोई खुद को सबसे बड़ा शिवभक्त क्लेम कर रहा है।

लेकिन राजनीति और धर्म के इस कॉकटेल के बीच जो लगातार कमजोर हो रहा है वह ‘लोकतंत्र’ है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश है। यहां सभी अपने धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हैं, ऐसे में राजनेताओं के मंदिर मस्जिद दौरे का क्या औचित्य बनता है? क्यों पाखंड का ये प्रदर्शन जरूरी है?

लोकतंत्र में जनता अपने नेतृत्व के लिए नेता को चुनती है। जनता चाहती है कि उसका नेता उसकी जरूरतों को पूरा करे। जनता के पैसों से जनता की सेवा करना होता है। जनता की जरूरत क्या है?

क्या जनता की जरूरत धर्म, मंदिर, मस्जिद, जनेऊ, टोपी है? या स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, पानी, रोजगार आदि है। राष्ट्रीय दल का तमगा लिए मंदिर-मस्जिद जाने वाले बीजेपी और कांग्रेस नेता कितनी बार स्कूल और अस्पताल के दौरे पर दिखते हैं?

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ख़ैर, एक ऐसा नेता है जो लगातार स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, पानी के निरक्षण पर ही रहता है। इस नेता की पार्टी अभी राष्ट्रीय दलों की सूची में नहीं है। लेकिन इस नेता और इसकी पार्टी के इरादों की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होती है।

राज्यीय दलों की सूची में शामिल दिल्ली की इस राजनीतिक पार्टी का नाम है आम आदमी पार्टी। इस पार्टी के सबसे बड़े नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आमतौर पर मंदिर मस्जिद का दौरा नहीं करते। केजरीवाल का ज्यादातर वक्त स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, पानी के निरक्षण में गुजरता है।

और शायद यही वजह है कि मेनस्ट्रीम मीडिया केजरीवाल और उनकी राजनीति को उतनी जगह नहीं देता जितनी मिलनी चाहिए। केजरीवाल अपने फिल्ड वर्क को सोशल मीडिया पर लाइव करते हैं।

लाइव के दौरान ही जनता की समस्या सुनते हैं और समाधान भी निकालते हैं। इतना ही नहीं समस्या के लिए जो अधिकारी जिम्मेदार होता है उसकी क्लास भी लगाते हैं।

अरविंद केजरीवाल की सरकार द्वारा विकसित की गई मोहल्ला क्लीनिक ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति बटोरी है। केजरीवाल आए दिन मोहल्ला क्लीनिक, सार्वजिनक शौचालयों, झुग्गी बस्ती का दौरा करते रहते हैं।

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दिल्ली के सरकारी स्कूल प्रमाण हैं केजरीवाल और उनकी टीम की मेहनत का। दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया आए दिन स्कूलों का दौरा करते रहते हैं।

केजरीवाल सरकार का दावा है कि उनके द्वारा विकसित दिल्ली के सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों से बेहतर हैं। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल सरकार में कोई कमी नहीं है, बहुत सी कमियां हैं। लेकिन वो कमियां मंदिर-मस्जिद का दौरा कर देश को बांटने के बराबर नहीं हैं।

केजरीवाल सरकार अपने कुल बजट का 26 फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करती है। और कांग्रेस-बीजेपी के पोस्टर बॉय अपना 90 फीसदी वक्त मंदिर-मस्जिद जाने में खर्च करते हैं।

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